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संरक्षक की कलम से
संरक्षक
॥ संकल्प के सामने कोई विकल्प नहीं होता ॥

मारा भारत वर्ष अनादिकाल से ही शिक्षा का केंद्र रहा है। हमारे ऋषि-मुनियों ने शिक्षा की एक ऐसी पद्धति विकसित की जो अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर, और मृत्यु से अमृत की ओर ले जाती है। गुरु के सानिध्य में रहकर शिष्य ज्ञान का अर्जन किया करते थे। इसलिए तत्कालीन विद्यालयों को गुरुकुल कहा जाता था।

गुरुकुल शिक्षा-पद्धति व्यक्ति के अज्ञान, अहंकार, अंधकार की जगह विनम्रता, सत्यनिष्ठा, साहस, स्वाभिमान, कर्तव्यपरायणता, करुणा, क्षमा, दया, तप, त्याग, प्रेम आदि मानवीय मूल्यों की स्थापना करती है। आज के भौतिकवादी युग में मनुष्य भौतिक सुखों की ओर तेजी से भाग रहा है।

भौतिक सुखों की अधिक-से-अधिक प्राप्ति को ही लक्ष्य बना बैठा है, नतीजा यह कि उसका आत्मिक सुख छिन रहा है। वह बाहर से जितना ही समृद्ध दिखता है, अंदर से उतना ही खोखला हो चुका होता है। आज की शिक्षा पद्धति मानव को मानव न बनाकर मशीन बना रही है।

आज बदले युग में आधुनिकता और प्राचीनता के सामंजस्य से ही संतुलित जीवन व उपलब्धि प्राप्त हो सकते हैं। आज न प्राचीनता पूरी तरह अपनायी जा सकती है और न ही आधुनिकता। दोनों के सार्थक बिंदुओं को एक साथ समाहित कर आगे बढ़ना ही श्रेयस्कर होगा।

इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु बिहटा आवासीय विद्यालय ने नये युग में नयी दृष्टि के साथ चलने का संकल्प लिया है। ग्रामीण व अतिसाधारण परिवार के बच्चों को अल्प शुल्क पर शिक्षा मुहैया कराना तथा उन्हें ख्याति प्राप्त शिक्षण संस्थानों के योग्य बनाना हमारा लक्ष्य है।

संरक्षक
डॉ. (प्रो.) जनेश्वर सिंह
पूर्व प्राचार्य, जैन कॉलेज, आरा
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