बच्चे किसी भी देश के भविष्य होते हैं तथा माता-पिता की आशाओं और सपनों के केंद्र होते हैं। हर एक माता-पिता अपने बच्चों को दुनिया की सबसे श्रेष्ठ शिक्षा देने के साथ-साथ उनको श्रेष्ठतम संस्कार भी देना चाहते हैं। भारत की शिक्षा परंपरा में शिक्षा एवं संस्कारों का श्रेष्ठतम दिव्य समन्वय है। इसी शिक्षा व्यवस्था का संगम है ‘बिहटा आवासीय विद्यालय’।
आज युवा-शक्ति निष्क्रिय एवं दिशाहीन है, लक्ष्यहीनता और मूल्यहीनता का शिकार है। युवा-शक्ति को सशक्त करने का प्रयास बचपन से ही होना चाहिए। पर दुःख इस बात की है कि आज भी कुछ अभिभावकगण अपना मूल कर्तव्य बच्चों के शिक्षा शुल्क जमा करने भर मानते हैं और बाकी सभी जिम्मेदारी बच्चों और विद्यालय पर थोप देते हैं।
इतना ही नहीं नामांकन के साथ ही या असमय अपने बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं का फॉर्म भरते हैं, जिसके कारण असफलता हाथ लगती है। असफलता से बच्चों में हीन भावना उत्पन्न होती है, जो कालांतर में घातक सिद्ध होती है।
सामाजिक संरचना बहुत तेजी से बदल रही है और उसके अनुरूप अपनी धारणाओं एवं भावनाओं में भी बदलाव की जरूरत है। लड़कियों और महिलाओं को पर्दों में न रखकर, उन्हें आगे बढ़ने के लिए अवसर दें, क्योंकि यह विदित है कि एक लड़की शिक्षित होती है तो एक परिवार शिक्षित होता है जो कालांतर में देश को दिशा भी देता है।
मैं आप सबों से अपील करता हूँ कि लड़कियों को स्वच्छ वातावरण व आज़ादी दें ताकि वे भी समाज व देश के विकास में अहम हिस्सा बनकर माता-पिता के सपनों को साकार करें।
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